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Friday, February 20, 2026

अमेरिकी सांसद का दावा कहा- भारत पर ज्यादा टैरिफ लगाने का बहाना खोज रहे हैं ट्रंप

वॉशिंगटन। अमेरिका और भारत के बीच व्यापारिक संबंधों में टैरिफ (आयात शुल्क) को लेकर खींचतान कम होने का नाम नहीं ले रही है। अमेरिकी सांसद ब्रैड शर्मन ने एक चौंकाने वाला दावा करते हुए कहा है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अभी भी भारत के खिलाफ भारी टैरिफ लगाने के बहाने तलाश रहे हैं। शर्मन के अनुसार, भारत को रूसी तेल की खरीद के नाम पर अलग से निशाना बनाया जा रहा है, जबकि इसी मुद्दे पर अन्य देशों के प्रति नरम रुख अपनाया जा रहा है।
सांसद ब्रैड शर्मन ने ट्रंप सरकार की नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि राष्ट्रपति दावा कर रहे हैं कि रूसी तेल के आयात के कारण भारत पर सख्ती जरूरी है। हालांकि, आंकड़ों के साथ इस तर्क को काटते हुए उन्होंने बताया कि हंगरी जैसा देश अपना 90 प्रतिशत तेल रूस से लेता है और उस पर कोई टैरिफ नहीं है। वहीं, रूस के सबसे बड़े खरीदार चीन पर भी रूसी तेल के कारण कोई अतिरिक्त प्रतिबंध नहीं लगाए गए हैं। शर्मन ने जोर देकर कहा कि भारत अपनी जरूरतों का केवल 21 प्रतिशत कच्चा तेल ही रूस से लेता है, फिर भी एक रणनीतिक सहयोगी होने के बावजूद उसे निशाना बनाना अनुचित है। उन्होंने मांग की है कि प्रशासन को तत्काल इस भेदभावपूर्ण नीति में बदलाव करना चाहिए।
हाल के महीनों में इस व्यापार युद्ध का असर भारत के निर्यात आंकड़ों पर साफ दिखाई दिया है। वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी में अमेरिका को भारत का वस्तु निर्यात लगभग 21.77 प्रतिशत गिरकर 6.6 अरब डॉलर रह गया। यह गिरावट पिछले साल के सितंबर, अक्टूबर और दिसंबर महीनों में भी दर्ज की गई थी। हालांकि, इसी अवधि में अमेरिका से भारत का आयात 23.71 प्रतिशत बढ़कर 4.5 अरब डॉलर पर पहुंच गया है। उल्लेखनीय है कि अमेरिका ने अगस्त में भारतीय वस्तुओं पर 50 प्रतिशत का भारी शुल्क लगाया था, जिसे हाल ही में एक अंतरिम समझौते के बाद घटाकर 18 प्रतिशत किया गया है। दिलचस्प बात यह है कि टैरिफ की इस मार से खुद अमेरिकी जनता भी त्रस्त है। फेडरल रिजर्व बैंक ऑफ न्यूयॉर्क के अर्थशास्त्रियों के एक नए विश्लेषण से पता चला है कि इन आयात शुल्कों का करीब 90 प्रतिशत बोझ विदेशी कंपनियों के बजाय खुद अमेरिकी उपभोक्ताओं और कारोबारियों ने उठाया है। एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, इन शुल्कों के कारण 2025 में हर अमेरिकी परिवार पर औसतन 1000 डॉलर का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ा, जो 2026 में बढ़कर 1300 डॉलर होने का अनुमान है। ऐसे में यह नीति न केवल भारत-अमेरिका व्यापारिक रिश्तों को प्रभावित कर रही है, बल्कि घरेलू स्तर पर भी महंगाई का कारण बन रही है।

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News Desk

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